भारत का संविधान

भारत का संविधान (प्रस्तावित प्रारूप)

प्रारंभिक टिप्पणी

संविधान पढ़ने से पूर्व

“भारत का संविधान (प्रस्तावित प्रारूप)” को पढ़ते और उसकी व्याख्या करते समय निम्नलिखित सिद्धांतों को सदैव ध्यान में रखा जाना चाहिए।
ये प्रावधान इस संविधान की आत्मा, उद्देश्य और राष्ट्र की मार्गदर्शक दर्शनशास्त्र को अभिव्यक्त करते हैं।

1. एकसदनीय विधानमंडल

राज्यसभा तथा उपराष्ट्रपति का पद समाप्त किया जाएगा।
भारत की संसद एकसदनीय (एक सदन वाली) विधान संस्था के रूप में कार्य करेगी।

2. न्याय तक निःशुल्क पहुँच

प्रत्येक नागरिक को न्याय निःशुल्क प्रदान किया जाएगा।
वकीलों को स्वतः किसी भी पक्ष का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं होगा।
केवल विशेष परिस्थितियों में सक्षम न्यायालय की पूर्व अनुमति से ही वकीलों को किसी प्रकरण में प्रतिनिधित्व की अनुमति दी जाएगी।

3. निःशुल्क शिक्षा का अधिकार

मध्य स्तर (मिडिल लेवल) तक की शिक्षा सभी नागरिकों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य होगी।

4. निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा का अधिकार

स्वास्थ्य सेवाएँ सभी नागरिकों के लिए निःशुल्क, सुलभ और समान रूप से उपलब्ध कराई जाएँगी।

5. चुनावी शुचिता

चुनाव प्रचार या घोषणापत्र में किसी प्रकार के मुफ्त उपहार, आर्थिक लाभ या भौतिक प्रलोभन का समावेश नहीं किया जाएगा।

6. गैर-दलीय लोकतांत्रिक संरचना

शासन प्रणाली बिना राजनीतिक दलों के संचालित होगी।
सभी जनप्रतिनिधि स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगे और जनता की सेवा हेतु स्वतंत्र सार्वजनिक पदाधिकारी के रूप में कार्य करेंगे।

7. सरलीकृत कर व्यवस्था

एकल-बिंदु कर प्रणाली लागू होगी जिसे “निकासी कर (Withdrawal Tax)” कहा जाएगा।
इसके अतिरिक्त केवल आयात एवं निर्यात शुल्क (Import & Export Duties) लागू होंगे।

बैंक जमा राशियों पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा।
कठोर मुद्रा (Hard Currency) का अधिकतम मूल्यवर्ग ₹50 होगा।

8. व्यापार नियंत्रण का सरलीकरण

मुख्य श्रेणियाँ:

  • प्रतिबंधित वस्तु सूची (Banned Items List)
  • सीमित/लाइसेंस प्राप्त वस्तु सूची (Restricted/Licensed Items List)

इन दोनों सूचियों से बाहर की सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए मुक्त व्यापार एवं निर्माण की अनुमति होगी।

9. भेदभावपूर्ण वर्गीकरण का उन्मूलन

“धर्म”, “जाति”, “वर्ण”, “पंथ”, “ओबीसी”, “अनुसूचित जाति”, “अनुसूचित जनजाति” आदि शब्द संविधान एवं सभी कानूनों से विलोपित किए जाएँगे ताकि सभी नागरिकों को समानता का अधिकार तथा समान अवसर प्राप्त हो।
फलस्वरूप, इन वर्गीकरणों के आधार पर किसी प्रकार का आरक्षण या विशेष लाभ अस्तित्व में नहीं रहेगा।

10. धर्म की परिभाषा

दो परिभाषाएँ:

  1. भारत का संविधान स्वयं समस्त नागरिकों का एकमात्र धर्म माना जाएगा।
  2. धर्म का सार:
    “अपना कर्तव्य निभाओ और किसी भी जीव — यहाँ तक कि प्रकृति — को अनुचित कारण से हानि मत पहुँचाओ।”

परिशिष्ट टिप्पणियाँ (Supplementary Notes)

टिप्पणी 1:

हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख और अन्य परंपराएँ “आस्था” या “दर्शन” के रूप में मानी जाएँगी।
प्रत्येक नागरिक को इनमें से किसी एक या एक से अधिक दर्शनों में विश्वास रखने, पालन करने या प्रेरणा लेने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।
किन्तु कोई भी साहित्य, ग्रंथ या पाठ जो घृणा फैलाए अथवा संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करे, उसकी समीक्षा की जाएगी तथा आवश्यकतानुसार उस सामग्री को प्रतिबंधित या विलोपित किया जाएगा।

टिप्पणी 2:

यह संविधान सरल, स्पष्ट और संक्षिप्त रूप में रचा गया है ताकि यह राष्ट्र की आत्मा को प्रतिबिंबित करे।
संचालन से संबंधित सभी विस्तृत विधिक एवं प्रक्रियात्मक विवरण पृथक अधीन विधायी उपकरणों, वैधानिक संहिताओं या विनियामक ढाँचों में प्रदान किए जाएँगे।

अनुच्छेद 1 : भारत की परिभाषा

भारत एक गणराज्य राष्ट्र है —जिसे उन पवित्र विभूतियों की भूमि के रूप में परिभाषित किया गया है,
जिनमें भगवान राम, श्रीकृष्ण, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, सिख गुरु, ऋषि और मुनि सम्मिलित हैं।

यह भूमि लगभग पाँच हज़ार वर्षों की प्राचीन सभ्यता का गौरव धारण करती है,
जिसकी उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता के आसपास हुई।

भौगोलिक दृष्टि से, भारत उत्तर में हिमाच्छादित हिमालय पर्वतमाला से आरंभ होकर
तीनों दिशाओं में समुद्र से घिरा हुआ है, और इसमें लक्षद्वीप, अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह,
तथा भारत के वैध समुद्री क्षेत्र सम्मिलित हैं।

कुल भौगोलिक क्षेत्रफल — 32,87,263 वर्ग किलोमीटर —
भारतीय आधिकारिक मानचित्र पर दर्शाया गया है।

अनुच्छेद 2 : भारत के नागरिक की परिभाषा

भारत की नागरिकता निम्नलिखित आधारों पर प्राप्त की जा सकती है —

  1. जन्म से
  2. वंश से
  3. पंजीकरण से
  4. प्राकृतिककरण (Naturalization) से, जैसा कि नागरिकता अधिनियम में परिभाषित है।

अनुच्छेद 3 : नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य

अनु 3(A) मौलिक अधिकार:

  1. समानता का अधिकार
  2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  3. देश के भीतर स्वतंत्र आवाजाही का अधिकार
  4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
  5. निःशुल्क न्याय प्राप्त करने का अधिकार
  6. गैर-गोपनीय सरकारी सूचनाओं तक पहुँच का अधिकार
  7. निःशुल्क चिकित्सा सेवा का अधिकार
  8. कम से कम मध्य विद्यालय स्तर तक निःशुल्क शिक्षा का अधिकार

अनु 3(B) मौलिक कर्तव्य:

  1. राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे
  2. सार्वजनिक संपत्ति एवं राष्ट्रीय धरोहरों की सुरक्षा करे
  3. राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्थाओं का आदर करे
  4. पर्यावरण की रक्षा करे
  5. स्वच्छता बनाये रखे
  6. संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे और अपव्यय से बचे
  7. दूसरों की स्वतंत्रता का हनन न करे
  8. किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधि से दूर रहे

अनुच्छेद 4 : शासन की प्रणाली

अनु 4 (A) राष्ट्रप्रमुख – “राष्ट्रपति”

1. चयन प्रक्रिया:

राष्ट्रपति का चुनाव संसद के वर्तमान सदस्यों (सांसदों) द्वारा किया जाएगा।
किसी प्रत्याशी के नामांकन के लिए कम से कम 50 सांसदों की अनुशंसा आवश्यक होगी।
संसद का अध्यक्ष चुनाव संपन्न कराने हेतु निर्वाचन अधिकारी (Returning Officer) नियुक्त करेगा, जो 30 दिनों के भीतर चुनाव कराएगा।

2. पात्रता:

प्रत्याशी की आयु नामांकन की अंतिम तिथि पर 30 से 80 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
उसके पास न्यूनतम स्नातक उपाधि होनी चाहिए या उसने किसी सूचीबद्ध कंपनी में MD / Chairman / CEO / CFO के रूप में कम से कम 15 वर्षों तक सेवा की हो, अथवा दोनों योग्यताएँ हों। प्रत्याशी की सामाजिक छवि स्वच्छ होनी चाहिए तथा पिछले 25 वर्षों में कोई आपराधिक प्रकरण नहीं होना चाहिए।

3. शपथ ग्रहण:

राष्ट्रपति की शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of Bharat) द्वारा दिलाई जाएगी।

4. पद रिक्त होने की स्थिति:

यदि कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति का देहांत हो जाए,
तो मुख्य न्यायाधीश अंतरिम रूप से राष्ट्रपति का कार्यभार संभालेंगे।
अंतरिम शपथ अगला वरिष्ठतम सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश दिलाएगा।
संसद अध्यक्ष 30 दिनों के भीतर नए राष्ट्रपति के निर्वाचन हेतु
Returning Officer नियुक्त करेगा।

अनु 4 (B) शासन प्रमुख – “प्रधानमंत्री”

  • 1. प्रधानमंत्री संसद के नेता होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा। संसद का कोई भी सदस्य इस पद के लिए पात्र होगा।
  • 2. प्रधानमंत्री को सदन का बहुमत प्राप्त होना चाहिए, जिसे आवश्यकता पड़ने पर सदन के पटल पर प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा।
  • 3. विशेष परिस्थितियों में, कोई गैर-सांसद भी संसद के बहुमत सदस्यों की अनुशंसा से प्रधानमंत्री नियुक्त किया जा सकता है, बशर्ते वह 6 माह के भीतर सांसद के रूप में निर्वाचित हो जाए।
  • 4. प्रधानमंत्री का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा, परंतु यह संसद के विश्वास (majority support) पर निर्भर करेगा। कोई व्यक्ति अधिकतम 3 कार्यकाल, और लगातार 2 से अधिक नहीं, प्रधानमंत्री रह सकेगा।

अनु 4(C) संसद — अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

  • 1. संसद के अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुनाव सदन के भीतर सामान्य निर्वाचन प्रक्रिया से किया जाएगा।
  • 2. सबसे वरिष्ठ सांसद अस्थायी रूप से प्रोटेम स्पीकर के रूप में कार्य करेगा, जो नए सांसदों को शपथ दिलाएगा और अध्यक्ष/उपाध्यक्ष के चुनाव संपन्न कराएगा।
  • 3. इन पदों का कार्यकाल 5 वर्ष होगा और इन्हें केवल वर्तमान सांसद ही धारण कर सकते हैं।

अनु 4(D) संसद की संरचना, अवधि और निर्वाचन प्रक्रिया

  • 1. संसद में आधे सदस्य सेवारत या सेवानिवृत्त प्रशासक (ब्यूरोक्रेट) होंगे तथा शेष आधे सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होंगे। किसी भी राजनीतिक दल का अस्तित्व नहीं होगा।
  • 2. आंशिक सेवानिवृत्ति (Staggered Retirement): निरंतरता बनाए रखने हेतु संसद एक साथ समाप्त नहीं होगी। प्रारंभ में सभी सांसद एक साथ निर्वाचित होंगे, तत्पश्चात प्रत्येक तीसरे वर्ष, दोनों वर्गों के एक-तिहाई सदस्य लॉटरी प्रणाली से सेवानिवृत्त होंगे, और उनके स्थान पर नए सांसद चुने जाएँगे।
  • 3. ब्यूरोक्रेट सांसदों के चयन की विस्तृत प्रक्रिया पृथक रूप से परिभाषित की जाएगी।
  • 4. निर्वाचन का दायित्व भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of Bharat) के अधीन होगा, जो मतदाता सूची बनाए रखेगा और सभी चुनावों का संचालन करेगा।

अनु 4(E) संसद के अधिकार और दायित्व

संसद राष्ट्र की सर्वोच्च संस्था होगी, जो नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) के माध्यम से करेगी, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करेंगे और जो राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होगी।

संसद संविधान की पवित्रता को बनाए रखते हुए, नीतियों का निर्माण, संशोधन और अनुमोदन करेगी।

अनु 4(F): शासन की प्रणाली —

निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकार और उत्तरदायित्व

अधिकार:

सांसदों को संसद में बोलने, प्रश्न पूछने, जानकारी प्राप्त करने, चर्चा में भाग लेने, बहस करने और मतदान करने का अधिकार होगा।
साथ ही, उन्हें विशेष संसदीय विशेषाधिकार एवं प्रतिरक्षा प्राप्त होगी।

कर्तव्य:

  1. अपने निर्वाचन क्षेत्र की आकांक्षाओं का निष्ठापूर्वक प्रतिनिधित्व करे
  2. विधिनिर्माण (Law-making) प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले
  3. कार्यपालिका (Executive) को उत्तरदायी बनाए रखे
  4. लोकतांत्रिक मूल्यों एवं संवैधानिक मर्यादाओं का संरक्षण करे

कार्यकाल एवं लाभ:

सांसद अधिकतम तीन कार्यकाल तक ही संसद सदस्य रह सकेगा, जिसमें लगातार दो कार्यकाल से अधिक नहीं होंगे। सांसदों के लिए कोई पेंशन योजना लागू नहीं होगी।

अनु 4(G): कार्यपालिका और प्रशासनिक सहयोग (ब्यूरोक्रेसी)

मंत्रिगण (राजनीतिक कार्यपालिका) को प्रशिक्षित प्रशासनिक सेवकों (Civil Servants) का सहयोग प्राप्त होगा।

ब्यूरोक्रेसी नीति-निर्माण, कार्यान्वयन, और विभागीय प्रशासन में निष्पक्षता तथा दक्षता बनाए रखते हुए शासन की निरंतरता सुनिश्चित करेगी।

ब्यूरोक्रेसी सरकार और नागरिकों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु (vital link) के रूप में कार्य करेगी।

अनु 4(H): न्यायपालिका की भूमिका

1. न्यायपालिका का मूल कर्तव्य त्वरित, स्वाभाविक एवं निःशुल्क न्याय प्रदान करना होगा। इसका मार्गदर्शक सिद्धांत होगा —

  • “कम विवाद, अधिक विकास” (“न्यूनविग्रहः, महान्विकासः”)

2. वकीलों पर प्रतिबंध:

न्यायपालिका की यह दक्षता तभी संभव होगी जब सामान्य परिस्थितियों में वकीलों को मुकदमे लड़ने की अनुमति न हो। केवल अपवादस्वरूप मामलों में सक्षम न्यायालय की अनुमति से ही वकील प्रतिनिधित्व कर सकेंगे। अधिकांश मामलों में नागरिक स्वयं अपना पक्ष रखेंगे।

3. सरलीकृत प्रक्रिया:

न्यायालय की कार्यवाही एवं प्रक्रियाएँ अत्यंत सरल, प्रभावी और पूर्णतः निःशुल्क होंगी।

4. न्यायिक दक्षता के मापदंड:

  1. मामलों के निस्तारण की न्यूनतम समयावधि
  2. वर्ष-दर-वर्ष आपराधिक/दीवानी मामलों की संख्या में कमी

अनु 4(I): मीडिया एवं सूचना प्रणाली की भूमिका

मीडिया एवं सूचना प्रणाली एक सुसूचित एवं जागरूक लोकतांत्रिक समाज की रीढ़ मानी जाएगी।

मीडिया का उद्देश्य:

  1. नागरिकों को शिक्षित और जागरूक रखना
  2. सरकार एवं जनता के बीच संवाद स्थापित करना
  3. सार्वजनिक मत निर्माण करना
  4. राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना
  5. संकट में सूचना-संचार सुनिश्चित करना

निगरानी एवं आचार नियंत्रण:

मीडिया से अपेक्षा होगी कि वह अनैतिक, असामाजिक या राष्ट्रविरोधी सामग्री से दूर रहे। इसके लिए एक सरकारी एजेंसी नैतिक नियंत्रण एवं निगरानी का कार्य करेगी।

अनुच्छेद 5 : केंद्र एवं राज्यों के मध्य संबंध

1. भारत एक संघीय गणराज्य है:

एक अविनाशी संघ (indestructible Union) जिसमें विनाशी राज्य (destructible States) सम्मिलित हैं। संसद को अधिकार होगा —

a) नए राज्य या केंद्रशासित प्रदेश बनाए

b) सीमाओं का पुनर्निर्धारण करे

c) राज्यों के नाम परिवर्तित करे

राज्यों को पृथक होने (secede) का कोई अधिकार नहीं होगा।

2. संघीय ढाँचा (Federal Structure):

शासन अंतर-राज्य परिषद, नीति आयोग, वित्त आयोग, अखिल भारतीय सेवाएँ एवं न्यायपालिका के माध्यम से संचालित होगा।

3. केंद्रीय अधिकारिता (Central Supremacy):

रक्षा, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा, विदेश नीति, व्यापार, मुद्रा, न्यायपालिका, नौकरशाही और वित्त जैसे विषयों पर केंद्र को सर्वोच्च अधिकार होगा।

4. राष्ट्रीय प्रतीक:

भारत में केवल एक राष्ट्रीय ध्वज और एक राष्ट्रीय गान मान्य होगा। राज्यों को पृथक ध्वज या गान अपनाने का अधिकार नहीं होगा।

5. राज्यीय स्वायत्तता:

स्थानीय प्रशासन, कृषि, स्वास्थ्य, भूमि अभिलेख, राजस्व आदि विषयों पर राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता होगी।

6. आपातकालीन स्थिति:

आपातकाल में केंद्र राज्य विषयों पर भी विधायी अधिकार का प्रयोग कर सकेगा।

अनुच्छेद 6 : राष्ट्र की विदेश नीति

1. भारत की विदेश नीति का आधार होगा — “वसुधैव कुटुम्बकम्” (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) तथा “भय बिन प्रीत न होई गोसाईं” (भय या सम्मानजन्य शक्ति के बिना सच्चा सौहार्द संभव नहीं)।

2. इसका उद्देश्य भारत को सैन्य, आर्थिक और आध्यात्मिक रूप से सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित करना होगा, किन्तु यह लक्ष्य शांतिपूर्ण साधनों द्वारा प्राप्त किया जाएगा।

अनुच्छेद 7 : राष्ट्र की रक्षा नीति

1. रक्षा नीति का मूल सिद्धांत होगा — “बल से शांति” (Peace through Strength) अर्थात् “भय बिन प्रीत न होई गोसाई”।

2. भारत किसी अन्य भूमि पर अधिकार नहीं करेगा, किन्तु किसी भी आक्रमण का उचित और दृढ़ प्रतिकार करेगा।

3. रक्षा नीति का उद्देश्य होगा — राष्ट्रीय संप्रभुता एवं अखंडता की रक्षा, आत्मनिर्भरता तथा तकनीकी नेतृत्व की दिशा में अग्रसर होना।

4. विशेष ध्यान क्षेत्रों में शामिल होंगे —

  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी
  • साइबर सुरक्षा
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
  • परमाणु ऊर्जा
  • सशस्त्र बलों हेतु स्वदेशी सैन्य उपकरणों का निर्माण

अनुच्छेद 8 : देश की राजकोषीय नीति (Fiscal Policy)

उद्देश्य:

एक सशक्त और अधिशेष (Surplus) अर्थव्यवस्था का निर्माण, निम्न उपायों द्वारा—

  1. राष्ट्रीय ऋण का उन्मूलन या न्यूनतमकरण
  2. फ्रीबी (मुफ़्त योजनाओं) का उन्मूलन और सब्सिडी में कमी
  3. एक भ्रष्टाचार-मुक्त समाज की स्थापना

प्राप्ति के उपाय:

  1. एकल “निकासी कर” (Withdrawal Tax) प्रणाली
  2. ₹50 की अधिकतम मुद्रा मूल्य सीमा (Maximum Hard Currency Denomination)
  3. न्यूनतम राजकोषीय विवाद एवं त्वरित निपटारा
  4. संतुलित, अर्थव्यवस्था-प्रधान बजट एवं अपव्यय से परहेज़

मार्गदर्शक सिद्धांत:

“न्यून कर, अधिकतम राजस्व”
(न्यूनः करः, अधिकतम् राजस्वम्)
(Minimum Tax, Maximum Revenue)

अनुच्छेद 9 : देश की स्वास्थ्य नीति (Health Policy)

प्राथमिकता:

“स्वास्थ्य ही धन है” (पहला सुख निरोगी काया / आरोग्यम् परम् संपदाम्) और “उपचार से बचाव बेहतर है” (रोगस्य कारणं निवारणम् उपचारात् श्रेष्ठम्)

सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बल:

  1. नियमित व्यायाम (विशेष रूप से योग) को जीवनचर्या का हिस्सा बनाना
  2. गुणवत्तापूर्ण आधारभूत संरचना एवं सुरक्षा से सड़क दुर्घटनाओं में कमी
  3. स्वास्थ्यकर भोजन, स्वच्छता, टीकाकरण, स्वच्छ एवं हरित पर्यावरण पर बल

सरकार द्वारा सुनिश्चित चिकित्सा देखभाल:

  1. सभी नागरिकों को निःशुल्क चिकित्सा उपचार (विदेशियों से शुल्क)
  2. प्रत्येक गाँव/क्लस्टर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
  3. प्रत्येक तालुका में छोटे अस्पताल
  4. प्रत्येक ज़िले में मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल
  5. प्रमुख शहरों में सुपर-मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल
  6. आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी) को प्रोत्साहन
  7. चिकित्सा उपकरण निर्माण को बढ़ावा
  8. भारतीय नागरिकों हेतु निःशुल्क चिकित्सकीय शिक्षा

अनुच्छेद 10 : देश की शिक्षा नीति

a) केवल योग्यता प्राप्त करने के बजाय सीखने और कौशल विकास पर मुख्य ध्यान दिया जाएगा।

b) निःशुल्क शिक्षा: प्रारंभिक रूप से सभी नागरिकों को मध्य विद्यालय स्तर तक निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाएगी,
जिसे धीरे-धीरे स्नातकोत्तर स्तर तक विस्तारित किया जाएगा।

c) शिक्षक विकास: सभी शिक्षकों के लिए कठोर और नियमित शिक्षण-कौशल विकास कार्यक्रम लागू होंगे, जिससे पारंपरिक बी.एड./एम.एड. प्रणाली को प्रतिस्थापित किया जाएगा।

d) पाठ्यक्रम का मानकीकरण एवं लचीलापन: एन.सी.ई.आर.टी. एवं यू.जी.सी. 60% सामान्य राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सुनिश्चित करेंगे, शेष 40% राज्य निर्धारित करेंगे।

e) सरलीकृत डिग्री प्रणाली: बी.ए., बी.एससी., बी.कॉम., बी.टेक., बी.बी.ए. आदि डिग्रियों का एकीकृत “स्नातक कार्यक्रम” में विलय होगा। स्नातकोत्तर स्तर पर विविध विषयों में विशेषज्ञता उपलब्ध होगी।

b) f) अनुकूलन एवं नवाचार: वैश्विक मानकों और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप बनने हेतु पाठ्यक्रम की समीक्षा प्रत्येक 3 वर्षों में की जाएगी। अनुसंधान कार्यक्रम नवाचार और मौलिक शोध पर आधारित होंगे।

अनुच्छेद 11 : देश की औद्योगिक एवं व्यापार नीति

  • पर्यावरणीय वर्गीकरण:
    पर्यावरणीय चिंताओं को ध्यान में रखते हुए औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को दो सूचियों में वर्गीकृत किया जाएगा:
    • सूची L1 – प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची: इन वस्तुओं का व्यापार या निर्माण किसी निजी संस्था द्वारा नहीं किया जा सकेगा (सरकार अपवाद)।
    • सूची L2 – सीमित/लाइसेंसयुक्त वस्तुओं की सूची: इनके व्यापार/निर्माण हेतु प्राधिकरण से लाइसेंस आवश्यक होगा।
  • मुक्त व्यापार:
    अन्य सभी वस्तुएँ बिना किसी अनुमति के स्वतंत्र रूप से व्यापार एवं निर्माण के लिए खुली रहेंगी।
  • पर्यावरणीय क्षेत्र-निर्धारण (Zoning):
    सरकार विशिष्ट औद्योगिक गतिविधियों के लिए विशेष क्षेत्र निर्धारित कर सकती है।

अनुच्छेद 12 : देश की पर्यावरण नीति

  • मूल सिद्धांत:
    “माता पृथ्वी सबकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है, परंतु सबके लालच के लिए नहीं।”
  • नीति का उद्देश्य:
    प्राकृतिक संसाधनों के अति-दोहन से हुए नुकसान को स्वीकार करना और पर्यावरण–विकास संतुलन बनाकर सतत विकास सुनिश्चित करना।

अनुच्छेद 13 : नागरिकों की मूल आवश्यकताएँ

  • विस्तारित मूल आवश्यकताएँ:
    रोटी, कपड़ा, मकान के अतिरिक्त—स्वच्छ वायु, शुद्ध जल, स्वच्छता, ऊर्जा, सस्ती सार्वजनिक परिवहन, इंटरनेट उपलब्धता आदि।

अनुच्छेद 14 : देश की जनसंख्या नीति

  • जनसंख्या घनत्व:
    प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या संसाधनों के समान वितरण का सूचक होगा।
  • अत्यधिक संकेंद्रण:
    अधिक जनसंख्या संसाधनों के दोहन, पर्यावरणीय क्षरण और सेवाओं की कमी का कारण बनती है।
  • “परिवार आकार विनियमन सूत्र”:
    संतुलित जनांकिकीय ढाँचा बनाए रखने के लिए राज्य नीति तैयार करेगा।
  • स्वैच्छिक पालन:
    शिक्षा, जागरूकता और प्रोत्साहनों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता के अनुरूप होगा।

अनुच्छेद 15 : संविधान संशोधन

  • दशकीय समीक्षा:
    हर 10 वर्ष में संविधान समीक्षा समिति बनेगी और अनुशंसाएँ देगी।
  • संसद की स्वीकृति:
    दो-तिहाई बहुमत से पारित विधेयक संविधान का अंग बन जाएगा।
  • तात्कालिक संशोधन:
    किसी भी समय दो-तिहाई बहुमत द्वारा संविधान संशोधित किया जा सकता है।